क्यों डालते हैं नदियों और जलाशयों में सिक्का, जानें इस प्राचीन परंपरा का रहस्य…

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आपने अक्सर देखा होगा कि रेल-बस यात्रा के दौरान रास्ते में आने वाले बड़े जलाशयों और पवित्र नदियों में लोग सिक्का डालते हैं। इसी प्रकार तीर्थस्थान के कुंडों-नदियों में भी सिक्का डालने की प्राचीन परंपरा है। इस परंपरा का रहस्य क्या है?

वास्तव में यह प्रथा दान का ही एक दूसरा रूप है। जल जीवनदाता होता है और इसका संबंध विभिन्न देवी-देवताओं से है। जब नदी या जलाशय आदि में सिक्का डालते हैं तो यह उसके दैवीय स्वरूप को एक भेंट चढ़ाने का तरीका होता है।
इसका दूसरा पहलू भी है। प्राचीन काल में तांबे के सिक्कों का प्रचलन था। चूंकि तांबा जल के शुद्धिकरण में काम आता है। आयुर्वेद में भी कहा गया है कि तांबे के बर्तन में रखा शुद्ध जल स्वास्थ्य के लिए अतिउत्तम होता है। इसलिए जब जलाशय या नदी में तांबे का सिक्का डालते थे तो यह उसे शुद्ध करता था।

चूंकि सिक्के धरातल में जाकर कई दिनों तक वहां जमा होते रहते थे। इससे उनका अंश धीरे-धीरे जल में घुलता था। इससे शुद्धिकरण की यह प्रक्रिया जारी रहती थी। आज तांबे के सिक्कों का प्रचलन नहीं है लेकिन सिक्का डालने की परंपरा पूर्ववत जारी है। ज्योतिष में भी विभिन्न दोष दूर करने के लिए जल में सिक्के व पूजन सामग्री प्रवाहित करने की प्रथा है। वर्तमान में ताम्र धातु के सिक्के चलन में नहीं हैं

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